Schizophrenia

World Mental Health Day 2020 : विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस हर साल 10 अक्टूबर को मनाया जाता है। जिसका उद्देश्य पूरे विश्व में मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाना और मानसिक स्वास्थ्य के समर्थन में प्रयास करना है। इस क्रम में हम आपको एक ऐसे मानसिक रोग के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके समाज में, आम जीवन में बहुत उदाहरण मिल जाएंगे। इसका नाम है सीजोफ्रेनिया Schizophrenia जिसका मतलब है स्प्लिट पर्सनालिटी। आइये इसके बारे में जानें कुछ ज़रूरी बातें।

1. Schizophrenia

एक गंभीर मानसिक परेशानी है। Schizophrenia का मतलब है स्प्लिट पर्सनालिटी। स्प्लिट पर्सनालिटी का मतलब ये नहीं की इंसान में दो पर्सनालिटी हो गयी। इसका मतलब होता है कि इंसान जो बोलता है, जो उसके विचार है और जो उसके इमोशन हैं, उसमे स्प्लिट हैं। यानि इंसान वर्तमान परिस्थिति के अनुसार व्यवहार नहीं करता। जैसे अगर उसे किसी के मौत की खबर देनी है तो वो ऐसे सिचुएशन में हंस देता है या सिचुएशन के विपरीत व्यवहार करता है। यानि कि उसके इमोशन और उसके व्यव्हार में स्प्लिट है। इसमें इंसान के दिमाग में Dopamine (एक प्रकार का केमिकल) की मात्रा बढ़ जाती है। ये केमिकल हर इंसान के अंदर होती है लेकिन एक Schizophrenic के अंदर इसकी मात्रा बढ़ जाती है। इससे वो कई सारी ऐसी चीज़ों को महसूस करने लगता है जो सच में होती ही नहीं है। उसको ऐसी आवाज़ें सुनाई देती हैं या किसी चीज़ का डर, जो हैं ही नहीं। वो एक अजीब से भ्रम में जीने लगता है। जैसे अगर एक कमरे में 6 पंखे है और उसमे से 2 पंखे चल रहे हैं तो उसे ऐसा लगता है की 2 बजकर चार मिनट पर कुछ होने वाला है। और सबसे बड़ी बात है कि वो अपनी बात पर टिका रहता है। आपके लाख समझाने पर भी उसके ऊपर कोई असर नहीं होता। इस बीमारी में इंसान की कार्य क्षमता भी काफी कम हो जाती है।

2. Delusion-

इस बीमारी में इंसान के सोच में Delusion होते है। मरीज़ को हमेशा ये लगता है को वो लोगों की नज़रों में है। वो जहाँ भी जा रहा है, जो भी कर रहा है, लोग उसे ही देख रहे हैं और उसके बारे में ही बातें कर रहे हैं। इसे डेलूशन्स ऑफ़ रेफ़्रेन्स कहते हैं। यानि कि सबके केंद्र में रहना। इंसान अपने गलत सोच को लेकर ज़िद्दी हो जाते हैं। अगर कोई समझने की कोशिश भी करे तो वो मानने को तैयार नहीं होते।

3. Delusion Of Precaution-

इसके अलावा दूसरा लक्षण जो है वो है Delusion Of Precaution यानि की जान का खतरा। इसमें मरीज़ को हमेशा ये अहसास बना रहता है कि कोई मेरे जान के पीछे है। घरवालों से लेकर बाहरवालों पर शक करने लगता है। जैसे किसी ने मेरे खाने में ज़हर मिला दिया हो। वो odd behavior करने लगता है। मरीज़ को लगने लगता है कि किसी ने उसके दिमाग में चिप लगा दिए हैं और कोई उसके सारे मन की बातें जान जायेगा। या उसे ये लगता है कि कोई उसका पीछा कर रहा है। सारी दुनिया उसके खिलाफ साज़िश कर रही है। उसकी दिनचर्या प्रभवित होने लगती है। टाइम से खाना, सोना, काम करना सबपर असर होने लगता है।

4. Hallucination-

schizophrenia में dopamine के बढ़ने से मरीज़ के परसेप्शन में सबसे ज़्यादा असर होता है। इसमें मरीज़ को Hallucination होने लगते हैं। Hallucination का मतलब है कानो में आवाज़ आना। वैसी आवाज़ जो असलियत में नहीं आ रही होती। उसे ये अहसास होता है कि कोई उसके बारे में बातें कर रहा है, और जब घरवाले उसे समझाने की कोशिश करते है कि कोई नहीं है तो उसके शक होने लगता है की घरवाले भी उससे मिले हुए हैं।

5. Self Talk-

इसका सबसे कॉमन लक्षण है कि इसमें मरीज़ खुद से बातें करने लगता है या बिना बात के हँसता रहता है। वो अपने मन की बनायी दुनिया में अपनी लड़ाई लड़ता है और हमेशा डरा हुआ रहता है।

6. Decrease Emotion Expression-

इसमें मरीज़ का मूड बहुत अधिक प्रभावित होता है। इसमें मरीज़ का मूड रिस्ट्रिक्टेड हो जाता है यानि कि न वो बहुत ज़्यादा खुश या बहुत ज़्यादा दुखी रहता है। उसके मूड की इंटेंसिटी ख़तम हो जाती है। जैसे अगर वो पहले खुल कर या ठहाके लगाकर हँसता था तो अब वो बहुत फीकी हंसी हँसता है। कभी कभी बहुत सपाट expressions होते हैं।

7. Behavior-

इसमें मरीज़ खोया खोया रहता है जिसे हम Autistic Behavior भी कहते हैं। वो अपनी ही दुनिया या अपनी ही फंतासी में गुम रहता है। मरीज़ अग्रेसिव हो जाता है। उसके आसपास के लोग उसके इस बर्ताव की वजह से उसे ज़्यादातर बंद करके रखते है।

8. Duration-

कम के कम १ महीने तक किसी व्यक्ति में ये लक्षण दिखे तो हम कहेंगे किसी उसे Schizophrenia है। अगर एक महीने से कम होता है है तो इसे Acute Psychosis माना जाता है। इस बीमारी का इलाज़ संभव है। जितनी जल्दी हम मरीज़ को अंडर ट्रीटमेंट ले आये उतनी ही जल्दी ठीक होने के सम्भावना रहती हैं। इस बीमारी में परिवार का साथ बहुत ज़रूरी होता है। कभी- कभी परिवार साथ रहती है लेकिन लगातार लम्बे समय तक मरीज़ का व्यवहार उन्हें परेशान कर देता है और वो भी छुटकारा पाने की कोशिश करने लगते हैं। उन्हें लोगों में मिलाने की ज़रुरत है। जितनी जल्दी हो सके उनका इलाज़ शुरू करवाए। दवाई से उनके डोपामाइन लेवल को कम किया जाता है जिससे उनके व्यवहार में परिवर्तन आ सके।

Pandey Nidhi
Therapeutic Counselor, Social worker.

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