शोक के प्रति बदले नजरिया

जब हमारे किसी अपने या किसी प्रिय व्यक्ति की मौत हो जाती है तो हम शोक मानते हैं, लेकिन कभी कभी हम अपने प्रियजन के जीवित रहने के बावजूद भी शोक मनाने को मजबूर हो जाते हैं ….यानि की तब जब आपका कोई अपना किसी गंभीर बीमारी के चपेट में आ जाता है, जिसमे उसकी मृत्यु तय है….. और खासकर वैसी बीमारी जिसमे व्यक्ति के कॉग्नेटिव और शारीरिक रूप से काम करने की क्षमता में कमी आ जाती है..

अक्सर एक पुरानी बीमारी के साथ किसी का लम्बे समय तक देखभाल करते हुए केयर गिवर को बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है….. इस अवस्था में उनका भावनात्मक रूप से बिखर जाना बहुत सामान्य है और खासकर तब जब हमें पता है की अब अंत नज़दीक है.. ऐसी हालत में अक्सर हम रोगी के सामने असहज महसूस करने लगते है… उनसे नज़र मिलाना मुश्किल हो जाता है.. उनके बदलते हुए व्यवहार की वजह से केयरगिवर को बहुत सारी शारीरिक और भावनात्मक कठिनाईओं के गुज़ारना पड़ता हैं.. रोगियों के चिड़चिड़ापन, झुंझलाहट, और गुस्सा को मैनेज करना बहुत चुनौतीपूर्ण होता है..अगर इन समस्याओं को समझदारी और हिम्मत से हैंडल न किया जाए तो केयरटेकर एक समय के बाद बर्नआउट होने लगता है और जिससे उसके मानसिक और शारीरिक रूप खुद बीमार होने की खतरे बढ़ जाते हैं। वो लगातार चिंतित रहने लगते है, थकान, अनिद्रा, बहुत अधिक वजन बढ़ना या घटना, आसानी से चिढ़ या नाराज होना, जिन गतिविधियों में उनकी रूचि होती है, उनमें रुचि खोना,लगातार सिरदर्द, शारीरिक दर्द या अन्य शारीरिक समस्याएं शामिल है..

एक केयरटेकर की सबसे बड़ी समस्या ये होती है की वो समझ ही नहीं पाता की मुझे इस स्थिति को कैसे मैनेज करना चाहिए, कैसे व्यवहार करना चाहिए, उसके खुद के अंदर चल रही तमाम झंझावात को सम्हालते हुए कैसे अपने प्रिय का ख्याल रखना चाहिए? कभी कभी केयरगिवर को मौत के बाद की योजना के बारे में सोचना और उसपर अमल करना महत्वपूर्ण हो जाता है …लम्बे समय तक देखभाल करते हुए हम कभी कभी उस व्यक्ति के मरने से पहले ही शोक मनाना शुरू कर सकते हैं। रोज़मर्रा में हो रहे नुकसान को झेलते हुए, साथ ही साथ जीवन के अंत में होने वाले नुकसान की आशंका से यानि, क्या हो रहा है और आगे क्या होगा, यह ख्याल भी मौत के समान ही दर्द देता है..कभी कभी आपके अपने प्रिय की हालत इतनी बुरी होती है की आप उसके लिए उसके जीवन का अंत ही चाहने लगते है, जिस वजह से केयरगिवर के अंदर गिल्ट, अवसाद, शर्म पनपने लगता है… इन भावनाओं को सामान्य रूप से पहचानना महत्वपूर्ण है.. anticipatory grief हमें परोक्ष रूप से तैयार करता है की हम आने वाले समय में कैसे खुद को भावनात्मक, आर्थिक, मानसिक रूप से मज़बूत कर सके. .. परिवार के सदस्यों को अनसुलझे मुद्दों को ध्यान में रखकर step by step उनपर विषयों पर काम करने की ज़रुरत होती है। कई बारआपको सच्चाई को स्वीकार करने में वक़्त लगता है की आपके किसी अपने को घातक बीमारी है। इसके साथ डील करने के भी सबके अलग अलग तरीके होते हैं.. कोई सहजता से स्वीकार करता है कोई रो कर करता है..

जब आपका पार्टनर इस अवस्था में होता है तो उस केस में कम्युनिअक्शन का बहुत महत्व होता है… ज़्यादातर कपल आपसी कम्युनिकेशन को ही कम कर देते हैं की कहीं इनसे दबा हुआ दर्द न दिख जाये.. इसलिए वो आपस में बातचीत ही कम कर देते हैं.. जो बाद में चलकर एक गहरे अवसाद को जनम देता है..जबकि मनोवैज्ञानिक शोध से पता चला है की खुल कर किया हुआ संवाद अक्सर बाद के घाव को भरने में बहुत जल्दी मदद करता है.. ऐसे समय में पहले बिताये हुए अच्छे समय को याद करना और एक दुसरे के गलतियों को माफ़ करना भी बहुत ज़रूरी होता है, नहीं तो वो ज़िन्दगी भर का गिल्ट बन जाता है..

आपका अपना जो की अब बीमार है,इससे आपके और उसके बीच के सम्बन्ध पर उसके बीमार होने की वजह से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने दे.. यदि आप चिंतित हैं, तो भी अपने रिश्ते की

मधुरता को बनाये रखने की कोशिश करें। नई संभावनाओं के लिए खुला होना भी महत्वपूर्ण है…अनसुलझे टकराव नई चुनौतियां पेश कर सकते हैं इसलिए उनको सुलझाने का प्रयास करें.. खूब बात करे.. माहौल को हल्का बना कर रखे.. मुश्किल है लेकिन असंभव नहीं..

याद रखें कि आपका प्रियजन अभी भी एक ही व्यक्ति है और अभी भी उसकी जरूरतें और इच्छाएं हैं..एक लम्बे समय तक तनावपूर्ण और थका देने वाला रूटीन जीते जीते केयर गिवर शारीरिक रूप से बहुत कमज़ोर हो जाता है.. सुनने और देखने की क्षमता, नींद न आने की समस्या जो देखभाल के दौरान शुरू हुयी थी वो मृत्यु के बाद भी जारी रहती है। इस दौरान हमारा मन में तरह तरह के ख्याल आते हैं.. कभी-कभी खुद को दोषी महसूस करना एक सामान्य बात है, लेकिन यह समझें कि कोई भी केयर गिवर परफेक्ट नहीं होता है की वो जो भी करे वो सही ही हो..आप किसी भी समय गलत भी हो सकते हैं.. सही होने के साथ साथ गलत होने की भी ज़िम्मेदारी उठाने का साहस रखिये..

 

 

दु: ख से निपटने के लिए हमारे पास कोई फिक्स्ड रोड मैप नहीं होता . उदाहरण के लिए, हमारे जीवन में जो कुछ हो रहा है, उसके आधार पर हम दुःखी होते हैं.. किसी विशेष अवसरों पर, जैसे एनिवर्सरी, जन्मदिन, इत्यादि मौकों पर हम अकेलेपन, अलगाव या अवसाद में घिरने लगते हैं..। ऐसे स्थिति में हम ज़्यादा से ज़्यदा उस पल को वैसे ही जिए जैसे हम पहले जीते थे…खुद को किसी ऐसी चीज़ या एक्टिविटी में इन्वोल्व करने की कोशिश करे.. देखभाल करने के साथ साथ अपने शारीरिक और भावनात्मक ज़रूरतों पर ध्यान दे… याद रखें, अगर आप अपनी देखभाल नहीं करते हैं, तो आप किसी और की देखभाल नहीं कर पाएंगे।

Pandey Nidhii.
(Therapeutic counselor.)

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